अभिनय योग कला
सुमन कुमार
सुमन कुमार
अभिनय विश्व में एक ऐसी प्रतिष्ठित जनूनी / व्यवसायिक कला है जिसमें सम्मान और समृद्धि दोनों का अभिनव मिश्रण है। अभिनय स्वयं के श्रोत और संसाधनों पर अधिकार व संतुलन से कल्पना के चरित्र की मानवीय भावपूर्ण सृजन की कला है। अभिनेता एक जीवित देहधारी है जो इच्छानुसार अपनी भोतिक अस्तित्व को बदल तो नहीं सकता पर वह इच्छानुसार आपको हर दूसरी चीज़ का जीवंत अनुभव कर और करा सकता है। अभिनेता साधता है अपना शरीर, अपनी आवाज़ फिर माँजता है उसे अपने अभ्यास से कि कल्पना कि इच्छित कलात्मक प्रस्तुति हो सके। ये एक तरह से स्वयं के आत्म की चरित्र के साथ एकात्म होने की कला है। योग है। अभिनय योग।
कई अभिनेताओं/कलाकारों को तो यही कहते सुना जाता है कि हम तो लगन लगाते हैं, साधना करते हैं, अभ्यास करते है। प्रदर्श कलाएं अपने कलाकारों के माध्यम से पात्र, परिवेश और प्रसंग के अनुसार ही जीवंत साधती हैं अपना सुर, लय, गति और रूप। इन सब का योग सफल हो तो संयोग होता है ना हो तो दुर्योग भी हो सकता है। प्रदर्श कलाएं जीवंत होती हैं और जीवन का पर्याय है स्वस्थ सांस और शरीर का होना। आत्मा और रूप। अभिनय यही संयोग है जो चरित्र की आत्मा की अभिव्यक्ति अभिनेता के रूप में करता है। अभिनेता एक जीवित माध्यम है जिसे पात्र होने के लिए अपनी सारी व्यक्तिगत पहचान से ऊपर उठ कर पात्र के गुण को स्वीकार करना पड़ता है पर एक साधक कि तरह। अभिनेता को वचन, बदन और चिंतन के घोड़े कि संयमित सवारी करने का और उसे नाट्यकार या कला निर्देशक के उद्देश्य को हासिल करने के भावनात्मक कार्य को सफलता करने का दायित्व निर्वाह करना होता है।
पूरी दुनिया में सभी लोग जो अभिनय के ऊंचे मक़ाम को हासिल करने के उद्योग में लगे हैं योग या इस जैसे ही कोई दूसरा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अभ्यास करते ही हैं और करें भी क्यूँ नहीं आखिरकार उन्हें आंगिक, वाचिक, आहार्य के मादयम से सात्विक भाव का अपना अनुभव श्रोता या दर्शकों तक पहुंचाना भी तो है। योग कि भारतीय परिदृश्य में आम उपस्थिती है। हमारे पुराण और महाकाव्य सभी योगियों के साधना के गुण गाते है। विरला ही कोई निकाल आएगा जो योग के बारे में सकारात्मक धारणा न रखे। योग का ज्ञान व्यक्ति से व्यक्ति, गुरु से शिष्य में हस्तांतरित होता है। योग अभ्यास एक सापेक्ष अभ्यास है जिसे व्यक्ति-विशेष के आकांक्षा और क्षमता के अनुरूप करना-कराना चाहिए। योग कई स्वास्थय संबंधी समस्याओं का समाधान कर सकता है पर यह सब कुछ नहीं कर सकता।
योग आपकी प्राकृतिक क्षमताओं का विस्तारण करता है और आपको अधिक लचीला, अधिक संयमित, संतुलित और सहज बनाता है। अभिनय कि कला में सिद्ध होने के लिए योग एक आरंभिक अभ्यास हैं जिसे किसी न किसी रूप में विश्व के सभी अभिनय-प्रशिक्षण कार्यक्रम में जगह दी गई है। लिंग, उम्र, धर्म, जाति, वर्ग और वर्ण से परे योग योग का अभ्यास सभी इन्सानों के लिए सहज ही ग्रहण करने योग्य है। योग भारतीय परंपरा के व्यावहारिक ज्ञान का एक ऐसा अनूठा अभ्यास है जो कलात्मक जीवन और व्यवसाय दोनों के लिए स्वीकार्य है। अभिनेता सांस, स्वर और संकल्पना का सामंजस्य अपनी भावनात्मक अभिव्यक्ति को साकार करने के लिए करता ही है। इसके बिना वह ना तो अच्छा गा सकता है, ना ही अच्छा नाच सकता है, ना ही अच्छा संवाद कर सकता है और ना ही अच्छा भावानुभाव कर सकता है।
भारतीय मानस में पहले भरत या अभिनेता के रूप में योगी नटराज शिव को माना जाता है जो प्रदर्श-कलाधारी है। नाट्यशास्त्र और योगसूत्र का सृजन समकालीन है। दोनों ही व्यक्ति विशेष को अपने संसाधनों पर संतुलन और अधिकार करने का ज्ञान और अभ्यास देते हैं। योग और अभिनय दोनों ही व्यक्ति के शरीर, मन और आत्मा यानि आंगिक, वाचिक और सात्विक को आवश्यकता और इच्छानुसार संचालित करने के लिए साधने की हिदायत देते हैं।
अभिनय जीवंत कला है जीवन नहीं अत: इसे हर जीवित व्यक्ति नहीं कर सकता। इसे सीखना पड़ता है या अभ्यास कर माँजना पड़ता है। नाटक, इस संसार के सभी कुछ, चाहे वह दृश्य हो श्रव्य हो या फिर अनुभूत हो, सबको अपने प्रसंग में समाहित कर सकता है और अभिनेता नाटक का जीव तत्व है जो अपने अभ्यास और दक्षता से पात्र के अभिनेय-रूप में जीवन के सभी ज़रूरी तत्वों का उपयोग कर एक भावनात्मक अनुभव, रसानुभूति के लिए संप्रेषित करता है। सम्प्रेषण को बहुजन के निमित्त होना है अत: उसे सामान्य नहीं विशेष अर्थ और तीव्रता के साथ कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करना पड़ता है। जीवन के यथार्थ के सुर, स्वर और गति मंच पर बहुधा सटीक नहीं होते क्यूंकि प्रयोक्ता और रसिक के बीच एक फ़ासला होता है जिसे पाटने के लिए प्रयोक्ता एक सक्रिय इकाई होने के कारण अपनी क्षमताओं का विधानुसार विस्तार करता है जिससे वह पात्रानुसार भावनात्मक अभिनय करता है ।
अभिनेता के पास जो संसाधन हैं वह हैं उसकी आवाज़ और उसका शरीर और उसके श्रोत है उसके अपने जातीय और दूसरों के रूपायित अनुभव जो किसी साहित्य या औडियो-विजवल दस्तावेज़ के रूप में हो सकते हैं, श्रुत-स्मृत हो सकते हैं, एक सुनिश्चित नाटकीय कल्पना को साकार करने के लिए जितनी अच्छी तरह अधिकार में होंगे पात्र का अभिनय उतना ही सटीक और दमदार होगा।
अभिनय और योग दोनों ही में व्यक्तित्व के बाहरी पक्ष यानी शरीर से अपना अभ्यास और अपनी क्रिया आरंभ करते हैं। शरीर का बाह्य पक्ष योग और अभिनय में एक व्यवहारिक और स्वीकृत आरंभिक बिंदु है। अभिनेता का पहला ही लक्ष्य होता है अंगों, प्रत्यंगों, पेशियों और तंत्रिकाओं के कार्यकलापों में सामंजस्य स्थापित करना। योग की तरह अभिनय में भी स्थूल शरीर से पात्र की यात्रा शुरू हो कर मानसिक और भावनात्मक पक्ष को उजागर करने को एकाग्र हो जाती है। योग विचार, वाणी और कर्म के बीच सामंजस्य का अभ्यास है यानी मन, वचन और कर्म के बीच सामंजस्य। अभिनेता भी तो यही करता है पर वो इसे साधता है अपने लिए नहीं बल्कि किसी चरित्र विशेष को रूपायित करने के लिए, अपनी विशेष कलात्मक चेतना, निर्देशक और नाटककार की कलात्मक चेतना के का समन्वय दर्शकों और श्रोताओं अनुभूत करवाने के निमित्त! योग के अभ्यास से भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक संबंधों के प्रति सजगता का विकास होता है जो अभिनेता की ज़रूरत है। योग और अभिनय दोनों को अभ्यास और अनुभूति के आधार पर ही समझा जा सकता है, उपयोग में लाया जा सकता है।
RAIBENSHE DANCE
AJIT KANOI AND GROUP
MURSHIDABAD, WB
23 June 2019, Meghdoot, Rabindra Bhawan
Sangeet Natak Akadem, New Delhi
RAIBENSHE DANCE
AJIT KANOI AND GROUP
MURSHIDABAD, WB
23 June 2019, Meghdoot, Rabindra Bhawan
Sangeet Natak Akadem, New Delhi
Gotipua, Odissa
Konark Naatya Mandap, Konark
23 June 2019, Meghdoot, Rabindra Bhawan
Sangeet Natak Akadem, New Delhi




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