Friday, June 28, 2019

The Story of Theatre in India

नाट्य परंपरा का खिस्सा

इति भारतीय

शिष्यों ने आखिरकार पूछ ही लिया  .... 

गुरुजी 
ज़रा खोल कर विस्तार से हमको बताए
ये नाटक का शास्त्र यानि, नाट्यशास्त्र कैसे बना 
सवाल सुन कर भरत बोले 
बहुत पुरानी बात है 
त्रेता युग का 
कहूँगा तो पतियाओगे नहीं 
अरे गुरुजी ऐसा कैसे हो सकता है 
आप सुनाएँ तो सही 
तो भरत जी सुनाने लगे 
एक दिन जब हम योग ध्यान कर अपना आँख खोले तो देखा 
सामने ब्रह्मा जी 
हम बोले नमस्कार 
वे कहने लगे 
बड़ी उम्मीद ले कर आपके पास आयें हैं 
देवता लोग तो किसी काम के नहीं 
मुझे तुम पर पूरा भरोसा है के तुम मना नहीं करोगे 
तुम सुनोगे की हमने क्या सोचा है तो खुश हो जाओगे 
भरत जी बोले 
बाबा बताएं जल्दी 
यहाँ तो दुनियाँ के जंजाल के बारे में सोच सोच कर दिमाग का दही हो गया है 
चारों ओर अमंगल ही अमंगल 
बवाल मचा है 
हंगामा ही हंगामा बेचैनी 
ब्रह्मा जी बोले भरत जी ये सब इसलिए है 
क्योंकि ज्ञान का बंटवारा सही नहीं है 
ज्ञान को वेदों में बांध कर रट्टू बना दिया गया है 
ज्ञान ही तो समस्त दोषों का शमन कर सकता है 
धरती पर जो हाहाकार मचा है 
मानवता पर जो संकट दिख रहा है 
देवताओं को भगा भगा कर 
राक्षस दानव यक्ष नाग मानव को अपने प्रभाव में ले रहें हैं 
उनकी प्रवृत्तियों को मानुष विरोधी बना रहें हैं 
जगत त्रस्त है 
देवता सिर्फ शिकायत करते हैं 
मैंने बहुत दिमाग़ लगाया, चारों वेदों को मथ डाला 
पिछले रात ऐसा जबर्दस्त नया विधान सूझा है की पूछो मत 
एकदम नायाब 
जो इसे करेगा उसे अर्थ धर्म यश और कर्म सब मिलेगा 
यानि वन इन ऑल 
जो देखेगा उसे अपना भी दिखेगा दर्पण की तरह 
इसमें मैंने ऋग्वेद का पाठ डाला है 
गीत सामवेद से ले कर जोड़ें हैं 
फिर यजुर्वेद से एक्टिंग यानि अभिनय का तड़का डाला है 
अथर्ववेद के रस से ऐसा रसीला बनाया हैं के पूछो मत 
रसिकों को आनंद आ जाएगा 
चारों वेद का आनंद एक साथ 
इसे मैं पंचम वेद कहूँगा 
कोयल के समान वातावरण कों अपनी मधुरता से छा लेने वाला 
उन्मुक्त ज्ञान गंगा 
मेरे तो चार मुख हैं सो इसे बाँचने के लिए मैं असमर्थ हूँ 
सोचा किसी देवता कों जिम्मा दूँ 
पर जिस देवता से कहता 
वह मुस्कुरा कर मना कर देता
कहते हैं ब्रह्मा जी इस इमोशनल अत्याचार के चक्कर मैं क्यूँ फँसाते हो 
अच्छा भला हम मुसकुराते हुए तुम्हें अच्छे नहीं भाते क्या 
हमारे ऐश ओ आराम पर क्यूँ आफत लाते हैं 
ये आर्ट हमसे नहीं जिनके लिए सोचा है उन्हीं से करवाओ 
मनुष्यों के पास जाओ 
बहुत सोचा तो आपका खयाल आया 
सो अब हाँ कहो और ये विद्या धरण करो 
ये विधा 
मनोयोग के जैविक प्रयोग की है 
उनके प्रदर्शन की है 
अंतस में मानव कि आद्रता के पहचान कि है 
सुख और दुख की है 
नृत्य वादन और गान की है 

ऐसा कुछ भी नहीं जिसे इस विधा का न माना जाए 

भरत बोले ,  इसके लिए तो मंडली चाहिए 
ब्रह्मा ने कहा तुम्हारे पास सौ पुत्र हैं इसीलिए तो आया हूँ 
जहां तक ट्रेनिंग का सवाल है 
शिव जी से तय हो गया है 
वे ट्रेनिंग दे देंगे 
और इसके लिए तीन वृत्ती का प्रयोग करो 
भारती, सात्वती और आरभटी !
ये वृत्ती क्या है ?
इसी से तो नाटक बनेगा आचार्य जी 
भारती मतलब वाकप्रधान, पुरुष प्रयोज्य, स्त्रीवर्जित,
संस्कृत संभासित 
पुरुषों का संस्कृत संभाषण ही समझो 
अब सात्वती  

.... 




लोक प्रतिभा

Saturday, June 22, 2019

अभिनय योग कला

अभिनय योग कला
सुमन कुमार
अभिनय विश्व में एक ऐसी प्रतिष्ठित जनूनी / व्यवसायिक कला है जिसमें सम्मान और समृद्धि दोनों का अभिनव मिश्रण है। अभिनय स्वयं के श्रोत और संसाधनों पर अधिकार व संतुलन से कल्पना के चरित्र की मानवीय भावपूर्ण सृजन की कला है। अभिनेता एक जीवित देहधारी है जो इच्छानुसार अपनी भोतिक अस्तित्व को बदल तो नहीं सकता पर वह इच्छानुसार आपको हर दूसरी चीज़ का जीवंत अनुभव कर और करा सकता है। अभिनेता साधता है अपना शरीर, अपनी आवाज़ फिर माँजता है उसे अपने अभ्यास से कि कल्पना कि इच्छित कलात्मक प्रस्तुति हो सके। ये एक तरह से स्वयं के आत्म की चरित्र के साथ एकात्म होने की कला है। योग है। अभिनय योग।
कई अभिनेताओं/कलाकारों को तो यही कहते सुना जाता है कि हम तो लगन लगाते हैं, साधना करते हैं, अभ्यास करते है। प्रदर्श कलाएं अपने कलाकारों के माध्यम से पात्र, परिवेश और प्रसंग के अनुसार ही जीवंत साधती हैं अपना सुर, लय, गति और रूप। इन सब का योग सफल हो तो संयोग होता है ना हो तो दुर्योग भी हो सकता है। प्रदर्श कलाएं जीवंत होती हैं और जीवन का पर्याय है स्वस्थ सांस और शरीर का होना। आत्मा और रूप। अभिनय यही संयोग है जो चरित्र की आत्मा की अभिव्यक्ति अभिनेता के रूप में करता है। अभिनेता एक जीवित माध्यम है जिसे पात्र होने के लिए अपनी सारी व्यक्तिगत पहचान से ऊपर उठ कर पात्र के गुण को स्वीकार करना पड़ता है पर एक साधक कि तरह। अभिनेता को वचन, बदन और चिंतन के घोड़े कि संयमित सवारी करने का और उसे नाट्यकार या कला निर्देशक के उद्देश्य को हासिल करने के भावनात्मक कार्य को सफलता करने का दायित्व निर्वाह करना होता है।
पूरी दुनिया में सभी लोग जो अभिनय के ऊंचे मक़ाम को हासिल करने के उद्योग में लगे हैं योग या इस जैसे ही कोई दूसरा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अभ्यास करते ही हैं और करें भी क्यूँ नहीं आखिरकार उन्हें आंगिक, वाचिक, आहार्य के मादयम से सात्विक भाव का अपना अनुभव श्रोता या दर्शकों तक पहुंचाना भी तो है। योग कि भारतीय परिदृश्य में आम उपस्थिती है। हमारे पुराण और महाकाव्य सभी योगियों के साधना के गुण गाते है। विरला ही कोई निकाल आएगा जो योग के बारे में सकारात्मक धारणा न रखे। योग का ज्ञान व्यक्ति से व्यक्ति, गुरु से शिष्य में हस्तांतरित होता है। योग अभ्यास एक सापेक्ष अभ्यास है जिसे व्यक्ति-विशेष के आकांक्षा और क्षमता के अनुरूप करना-कराना चाहिए। योग कई स्वास्थय संबंधी समस्याओं का समाधान कर सकता है पर यह सब कुछ नहीं कर सकता।
योग आपकी प्राकृतिक क्षमताओं का विस्तारण करता है और आपको अधिक लचीला, अधिक संयमित, संतुलित और सहज बनाता है। अभिनय कि कला में सिद्ध होने के लिए योग एक आरंभिक अभ्यास हैं जिसे किसी न किसी रूप में विश्व के सभी अभिनय-प्रशिक्षण कार्यक्रम में जगह दी गई है। लिंग, उम्र, धर्म, जाति, वर्ग और वर्ण से परे योग योग का अभ्यास सभी इन्सानों के लिए सहज ही ग्रहण करने योग्य है। योग भारतीय परंपरा के व्यावहारिक ज्ञान का एक ऐसा अनूठा अभ्यास है जो कलात्मक जीवन और व्यवसाय दोनों के लिए स्वीकार्य है। अभिनेता सांस, स्वर और संकल्पना का सामंजस्य अपनी भावनात्मक अभिव्यक्ति को साकार करने के लिए करता ही है। इसके बिना वह ना तो अच्छा गा सकता है, ना ही अच्छा नाच सकता है, ना ही अच्छा संवाद कर सकता है और ना ही अच्छा भावानुभाव कर सकता है।
भारतीय मानस में पहले भरत या अभिनेता के रूप में योगी नटराज शिव को माना जाता है जो प्रदर्श-कलाधारी है। नाट्यशास्त्र और योगसूत्र का सृजन समकालीन है। दोनों ही व्यक्ति विशेष को अपने संसाधनों पर संतुलन और अधिकार करने का ज्ञान और अभ्यास देते हैं। योग और अभिनय दोनों ही व्यक्ति के शरीर, मन और आत्मा यानि आंगिक, वाचिक और सात्विक को आवश्यकता और इच्छानुसार संचालित करने के लिए साधने की हिदायत देते हैं।
अभिनय जीवंत कला है जीवन नहीं अत: इसे हर जीवित व्यक्ति नहीं कर सकता। इसे सीखना पड़ता है या अभ्यास कर माँजना पड़ता है। नाटक, इस संसार के सभी कुछ, चाहे वह दृश्य हो श्रव्य हो या फिर अनुभूत हो, सबको अपने प्रसंग में समाहित कर सकता है और अभिनेता नाटक का जीव तत्व है जो अपने अभ्यास और दक्षता से पात्र के अभिनेय-रूप में जीवन के सभी ज़रूरी तत्वों का उपयोग कर एक भावनात्मक अनुभव, रसानुभूति के लिए संप्रेषित करता है। सम्प्रेषण को बहुजन के निमित्त होना है अत: उसे सामान्य नहीं विशेष अर्थ और तीव्रता के साथ कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करना पड़ता है। जीवन के यथार्थ के सुर, स्वर और गति मंच पर बहुधा सटीक नहीं होते क्यूंकि  प्रयोक्ता और रसिक के बीच एक फ़ासला होता है जिसे पाटने के लिए प्रयोक्ता एक सक्रिय इकाई होने के कारण अपनी क्षमताओं का विधानुसार विस्तार करता है जिससे वह पात्रानुसार भावनात्मक अभिनय करता है ।
अभिनेता के पास जो संसाधन हैं वह हैं उसकी आवाज़ और उसका शरीर और उसके श्रोत है उसके अपने जातीय और दूसरों के रूपायित अनुभव जो किसी साहित्य या औडियो-विजवल दस्तावेज़ के रूप में हो सकते हैं, श्रुत-स्मृत हो सकते हैं, एक सुनिश्चित नाटकीय कल्पना को साकार करने के लिए जितनी अच्छी तरह अधिकार में होंगे पात्र का अभिनय उतना ही सटीक और दमदार होगा।
अभिनय और योग दोनों ही में  व्यक्तित्व के बाहरी पक्ष यानी शरीर से अपना अभ्यास और अपनी क्रिया आरंभ करते हैं। शरीर का बाह्य पक्ष योग और अभिनय में एक व्यवहारिक और स्वीकृत आरंभिक बिंदु है। अभिनेता का पहला ही लक्ष्य होता है अंगों, प्रत्यंगों, पेशियों और तंत्रिकाओं के कार्यकलापों में  सामंजस्य स्थापित करना। योग की तरह अभिनय में भी स्थूल शरीर से पात्र की यात्रा शुरू हो कर मानसिक और भावनात्मक पक्ष को उजागर करने को एकाग्र हो जाती है। योग विचार, वाणी और कर्म के बीच सामंजस्य का अभ्यास है यानी मन, वचन और कर्म के बीच सामंजस्य। अभिनेता भी तो यही करता है पर वो इसे साधता है अपने लिए नहीं बल्कि किसी चरित्र विशेष को रूपायित करने के लिए, अपनी विशेष कलात्मक चेतना, निर्देशक और नाटककार की कलात्मक चेतना के का समन्वय दर्शकों और श्रोताओं अनुभूत करवाने के निमित्त! योग के अभ्यास से भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक संबंधों के प्रति सजगता का विकास होता है जो अभिनेता की ज़रूरत है। योग और अभिनय दोनों को अभ्यास और अनुभूति के आधार पर ही समझा जा सकता है, उपयोग में लाया जा सकता है।


RAIBENSHE DANCE
AJIT KANOI AND GROUP
MURSHIDABAD, WB
23 June 2019, Meghdoot, Rabindra Bhawan
Sangeet Natak Akadem, New Delhi

RAIBENSHE DANCE
AJIT KANOI AND GROUP
MURSHIDABAD, WB
23 June 2019, Meghdoot, Rabindra Bhawan
Sangeet Natak Akadem, New Delhi

Gotipua, Odissa
Konark Naatya Mandap, Konark
23 June 2019, Meghdoot, Rabindra Bhawan
Sangeet Natak Akadem, New Delhi