नाट्य परंपरा का खिस्सा
इति भारतीय
शिष्यों ने आखिरकार पूछ ही लिया ....
गुरुजी
ज़रा खोल कर विस्तार से हमको बताए
ये नाटक का शास्त्र यानि, नाट्यशास्त्र कैसे बना
सवाल सुन कर भरत बोले
बहुत पुरानी बात है
त्रेता युग का
कहूँगा तो पतियाओगे नहीं
अरे गुरुजी ऐसा कैसे हो सकता है
आप सुनाएँ तो सही
तो भरत जी सुनाने लगे
एक दिन जब हम योग ध्यान कर अपना आँख खोले तो देखा
सामने ब्रह्मा जी
हम बोले नमस्कार
वे कहने लगे
बड़ी उम्मीद ले कर आपके पास आयें हैं
देवता लोग तो किसी काम के नहीं
मुझे तुम पर पूरा भरोसा है के तुम मना नहीं करोगे
तुम सुनोगे की हमने क्या सोचा है तो खुश हो जाओगे
भरत जी बोले
बाबा बताएं जल्दी
यहाँ तो दुनियाँ के जंजाल के बारे में सोच सोच कर दिमाग का दही हो गया है
चारों ओर अमंगल ही अमंगल
बवाल मचा है
हंगामा ही हंगामा बेचैनी
ब्रह्मा जी बोले भरत जी ये सब इसलिए है
क्योंकि ज्ञान का बंटवारा सही नहीं है
ज्ञान को वेदों में बांध कर रट्टू बना दिया गया है
ज्ञान ही तो समस्त दोषों का शमन कर सकता है
धरती पर जो हाहाकार मचा है
मानवता पर जो संकट दिख रहा है
देवताओं को भगा भगा कर
राक्षस दानव यक्ष नाग मानव को अपने प्रभाव में ले रहें हैं
उनकी प्रवृत्तियों को मानुष विरोधी बना रहें हैं
जगत त्रस्त है
देवता सिर्फ शिकायत करते हैं
मैंने बहुत दिमाग़ लगाया, चारों वेदों को मथ डाला
पिछले रात ऐसा जबर्दस्त नया विधान सूझा है की पूछो मत
एकदम नायाब
जो इसे करेगा उसे अर्थ धर्म यश और कर्म सब मिलेगा
यानि वन इन ऑल
जो देखेगा उसे अपना भी दिखेगा दर्पण की तरह
इसमें मैंने ऋग्वेद का पाठ डाला है
गीत सामवेद से ले कर जोड़ें हैं
फिर यजुर्वेद से एक्टिंग यानि अभिनय का तड़का डाला है
अथर्ववेद के रस से ऐसा रसीला बनाया हैं के पूछो मत
रसिकों को आनंद आ जाएगा
चारों वेद का आनंद एक साथ
इसे मैं पंचम वेद कहूँगा
कोयल के समान वातावरण कों अपनी मधुरता से छा लेने वाला
उन्मुक्त ज्ञान गंगा
मेरे तो चार मुख हैं सो इसे बाँचने के लिए मैं असमर्थ हूँ
सोचा किसी देवता कों जिम्मा दूँ
पर जिस देवता से कहता
वह मुस्कुरा कर मना कर देता
कहते हैं ब्रह्मा जी इस इमोशनल अत्याचार के चक्कर मैं क्यूँ फँसाते हो
अच्छा भला हम मुसकुराते हुए तुम्हें अच्छे नहीं भाते क्या
हमारे ऐश ओ आराम पर क्यूँ आफत लाते हैं
ये आर्ट हमसे नहीं जिनके लिए सोचा है उन्हीं से करवाओ
मनुष्यों के पास जाओ
बहुत सोचा तो आपका खयाल आया
सो अब हाँ कहो और ये विद्या धरण करो
ये विधा
इति भारतीय
शिष्यों ने आखिरकार पूछ ही लिया ....
गुरुजी
ज़रा खोल कर विस्तार से हमको बताए
ये नाटक का शास्त्र यानि, नाट्यशास्त्र कैसे बना
सवाल सुन कर भरत बोले
बहुत पुरानी बात है
त्रेता युग का
कहूँगा तो पतियाओगे नहीं
अरे गुरुजी ऐसा कैसे हो सकता है
आप सुनाएँ तो सही
तो भरत जी सुनाने लगे
एक दिन जब हम योग ध्यान कर अपना आँख खोले तो देखा
सामने ब्रह्मा जी
हम बोले नमस्कार
वे कहने लगे
बड़ी उम्मीद ले कर आपके पास आयें हैं
देवता लोग तो किसी काम के नहीं
मुझे तुम पर पूरा भरोसा है के तुम मना नहीं करोगे
तुम सुनोगे की हमने क्या सोचा है तो खुश हो जाओगे
भरत जी बोले
बाबा बताएं जल्दी
यहाँ तो दुनियाँ के जंजाल के बारे में सोच सोच कर दिमाग का दही हो गया है
चारों ओर अमंगल ही अमंगल
बवाल मचा है
हंगामा ही हंगामा बेचैनी
ब्रह्मा जी बोले भरत जी ये सब इसलिए है
क्योंकि ज्ञान का बंटवारा सही नहीं है
ज्ञान को वेदों में बांध कर रट्टू बना दिया गया है
ज्ञान ही तो समस्त दोषों का शमन कर सकता है
धरती पर जो हाहाकार मचा है
मानवता पर जो संकट दिख रहा है
देवताओं को भगा भगा कर
राक्षस दानव यक्ष नाग मानव को अपने प्रभाव में ले रहें हैं
उनकी प्रवृत्तियों को मानुष विरोधी बना रहें हैं
जगत त्रस्त है
देवता सिर्फ शिकायत करते हैं
मैंने बहुत दिमाग़ लगाया, चारों वेदों को मथ डाला
पिछले रात ऐसा जबर्दस्त नया विधान सूझा है की पूछो मत
एकदम नायाब
जो इसे करेगा उसे अर्थ धर्म यश और कर्म सब मिलेगा
यानि वन इन ऑल
जो देखेगा उसे अपना भी दिखेगा दर्पण की तरह
इसमें मैंने ऋग्वेद का पाठ डाला है
गीत सामवेद से ले कर जोड़ें हैं
फिर यजुर्वेद से एक्टिंग यानि अभिनय का तड़का डाला है
अथर्ववेद के रस से ऐसा रसीला बनाया हैं के पूछो मत
रसिकों को आनंद आ जाएगा
चारों वेद का आनंद एक साथ
इसे मैं पंचम वेद कहूँगा
कोयल के समान वातावरण कों अपनी मधुरता से छा लेने वाला
उन्मुक्त ज्ञान गंगा
मेरे तो चार मुख हैं सो इसे बाँचने के लिए मैं असमर्थ हूँ
सोचा किसी देवता कों जिम्मा दूँ
पर जिस देवता से कहता
वह मुस्कुरा कर मना कर देता
कहते हैं ब्रह्मा जी इस इमोशनल अत्याचार के चक्कर मैं क्यूँ फँसाते हो
अच्छा भला हम मुसकुराते हुए तुम्हें अच्छे नहीं भाते क्या
हमारे ऐश ओ आराम पर क्यूँ आफत लाते हैं
ये आर्ट हमसे नहीं जिनके लिए सोचा है उन्हीं से करवाओ
मनुष्यों के पास जाओ
बहुत सोचा तो आपका खयाल आया
सो अब हाँ कहो और ये विद्या धरण करो
ये विधा
मनोयोग के जैविक प्रयोग की है
उनके प्रदर्शन की है
अंतस में मानव कि आद्रता के पहचान कि है
उनके प्रदर्शन की है
अंतस में मानव कि आद्रता के पहचान कि है
सुख और दुख की है
नृत्य वादन और गान की है
नृत्य वादन और गान की है
ऐसा कुछ भी नहीं जिसे इस विधा का न माना जाए
भरत बोले , इसके लिए तो मंडली चाहिए
ब्रह्मा ने कहा तुम्हारे पास सौ पुत्र हैं इसीलिए तो आया हूँ
जहां तक ट्रेनिंग का सवाल है
शिव जी से तय हो गया है
वे ट्रेनिंग दे देंगे
और इसके लिए तीन वृत्ती का प्रयोग करो
भारती, सात्वती और आरभटी !
ये वृत्ती क्या है ?
इसी से तो नाटक बनेगा आचार्य जी
भारती मतलब वाकप्रधान, पुरुष प्रयोज्य, स्त्रीवर्जित,
संस्कृत संभासित
पुरुषों का संस्कृत संभाषण ही समझो
अब सात्वती
....
पुरुषों का संस्कृत संभाषण ही समझो
अब सात्वती
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